ईरान ने फिर से दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण समुद्री पट्टी होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) को लेकर अपनी सख्ती बढ़ा दी है। ये कोई मामूली बदलाव नहीं है। अब इस रास्ते से गुजरने वाले हर जहाज को ईरान के कड़े सवालों की लिस्ट से गुजरना होगा। ईरान ने साफ कर दिया है कि अगर आपको इस संकरे रास्ते का इस्तेमाल करना है, तो आपको उनके 40 सवालों का जवाब देना ही पड़ेगा। ये सीधे तौर पर ग्लोबल ट्रेड और समुद्री सुरक्षा के समीकरणों को बदलने वाली खबर है।
होर्मुज स्ट्रेट की अहमियत और ईरान का दांव
दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल इसी एक संकरे रास्ते से होकर गुजरता है। आप इसे ग्लोबल इकॉनमी की गर्दन कह सकते हैं। ईरान लंबे समय से इस क्षेत्र में अपनी धाक जमाने की कोशिश करता रहा है। ताज़ा रिपोर्ट्स बताती हैं कि ईरान की नौसेना अब उन सभी कमर्शियल जहाजों की बारीकी से जांच करेगी जो ओमान की खाड़ी और फारस की खाड़ी के बीच के इस हिस्से का इस्तेमाल करते हैं। Also making waves recently: Why Chile Foreign Affairs Minister Alberto van Klaveren is visiting India now.
ईरान का ये कदम सिर्फ सुरक्षा से जुड़ा नहीं है। ये एक राजनीतिक संदेश भी है। जब आप किसी अंतरराष्ट्रीय शिपिंग रूट पर इस तरह की शर्तें थोपते हैं, तो आप दुनिया को बता रहे होते हैं कि चाबी आपके हाथ में है। पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका के साथ ईरान के तनावपूर्ण रिश्तों के बीच ये फैसला आग में घी डालने जैसा है।
वो 40 सवाल जो बदल देंगे शिपिंग का तरीका
ईरान ने जो प्रश्नावली तैयार की है, वो काफी लंबी और पेचीदा है। इसमें सिर्फ जहाज के नाम या गंतव्य की जानकारी नहीं मांगी गई है। इसमें जहाज के मालिक, कार्गो की सटीक प्रकृति, पिछले पोर्ट्स की जानकारी और यहाँ तक कि चालक दल के सदस्यों के बारे में भी विस्तार से पूछा जा रहा है। More details into this topic are detailed by The New York Times.
शिपिंग कंपनियों के लिए ये किसी सिरदर्द से कम नहीं है। पहले से ही लाल सागर में हूती विद्रोहियों के हमलों के कारण ग्लोबल सप्लाई चेन दबाव में है। अब ईरान की ये नई डिमांड प्रक्रिया को और धीमा कर देगी। अगर कोई जहाज जानकारी देने से मना करता है या गलत जानकारी देता है, तो ईरान उसे जब्त करने या वापस भेजने की ताकत रखता है। ये जोखिम कोई भी बड़ी तेल कंपनी नहीं उठाना चाहती।
जहाजों को अपनी पहचान और लोकेशन बताने वाले सिस्टम (AIS) को लेकर भी कड़े निर्देश दिए गए हैं। अक्सर सुरक्षा कारणों से जहाज अपना ट्रांसपोंडर बंद कर देते हैं, लेकिन ईरान अब इसे अपनी शर्तों के उल्लंघन के तौर पर देख रहा है।
सुरक्षा का बहाना या कंट्रोल की चाहत
ईरान का तर्क है कि ये सब क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए किया जा रहा है। उनका कहना है कि वे नशीले पदार्थों की तस्करी और अवैध हथियारों की आवाजाही रोकना चाहते हैं। लेकिन विशेषज्ञ इसे अलग नजरिए से देखते हैं। ये वास्तव में अमेरिका और उसके सहयोगियों पर दबाव बनाने की एक रणनीति है।
फारस की खाड़ी में तेल के टैंकरों पर होने वाले हमलों का इतिहास पुराना है। ईरान अक्सर इन हमलों के लिए विदेशी दखल को जिम्मेदार ठहराता है। अब इन 40 सवालों के जरिए वो हर उस गतिविधि पर नजर रखना चाहता है जो उसकी सीमाओं के पास हो रही है। ये एक तरह का डिजिटल और फिजिकल घेराव है।
ग्लोबल ट्रेड पर पड़ने वाला असर
अगर होर्मुज स्ट्रेट में ट्रैफिक धीमा होता है, तो इसका असर आपकी जेब पर पड़ेगा। तेल की कीमतें सीधे तौर पर इस रूट की स्थिरता से जुड़ी हैं। जब भी यहाँ तनाव बढ़ता है, कच्चे तेल के दाम ऊपर भागने लगते हैं।
शिपिंग इंश्योरेंस के प्रीमियम भी बढ़ रहे हैं। बीमा कंपनियां अब इस रूट को "हाई रिस्क" मान रही हैं। इसका मतलब है कि माल ढुलाई महंगी होगी और अंततः सामान के दाम बढ़ेंगे। भारत जैसे देशों के लिए ये खबर अच्छी नहीं है, क्योंकि हमारी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से आता है।
चीन भी इस स्थिति पर नजर बनाए हुए है। चीन के लिए ईरान एक बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता है, लेकिन चीन खुद भी एक बड़ी व्यापारिक शक्ति है जिसे समुद्री रास्तों की सुगमता पसंद है। ईरान का ये कदम चीन के हितों के खिलाफ भी जा सकता है, जिससे कूटनीतिक संबंध जटिल हो सकते हैं।
जहाजों के लिए अब क्या रास्ता बचा है
शिपिंग ऑपरेटर्स के पास फिलहाल सीमित विकल्प हैं। या तो वे ईरान की शर्तों को मानें और उन 40 सवालों का जवाब दें, या फिर वे अफ्रीका के पास 'केप ऑफ गुड होप' वाले लंबे और महंगे रास्ते को चुनें। लेकिन तेल के टैंकरों के लिए ये रास्ता व्यावहारिक नहीं है।
ईरान की समुद्री सेना (IRGC Navy) इस क्षेत्र में काफी सक्रिय है। वे छोटे और तेज गश्ती जहाजों का उपयोग करते हैं जिन्हें पकड़ना बड़े टैंकरों के लिए मुश्किल होता है। ऐसे में टकराव की स्थिति बनने का खतरा हमेशा बना रहता है।
क्या ये अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन है
समुद्री कानून (UNCLOS) के तहत जहाजों को 'इनोसेंट पैसेज' यानी शांतिपूर्ण तरीके से गुजरने का अधिकार है। हालांकि, ईरान ने इस संधि के सभी हिस्सों को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है। वो होर्मुज को अपनी प्रादेशिक सीमा का हिस्सा मानता है और वहां अपने नियम थोपने का दावा करता है।
अमेरिका और यूरोपीय देशों ने पहले ही इस पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में इस तरह की पाबंदियां लगाना अवैध है। लेकिन कागजी कानूनों और समुद्र की लहरों पर मौजूद बंदूकों में बहुत फर्क होता है। जमीन पर सच्चाई यही है कि फिलहाल ईरान का पलड़ा भारी है।
शिपिंग कंपनियों को क्या करना चाहिए
अगर आप इस इंडस्ट्री से जुड़े हैं, तो आपको अपनी कागजी कार्रवाई को और भी दुरुस्त करना होगा। ईरान की मांग के अनुसार डेटा शेयरिंग अब एक मजबूरी है। चालक दल को इन स्थितियों के लिए ट्रेनिंग देना जरूरी है ताकि वे तनावपूर्ण पूछताछ के दौरान शांति से काम ले सकें।
सप्लाई चेन मैनेजमेंट में अब "ईरान फैक्टर" को शामिल करना ही होगा। देरी की संभावनाओं को देखते हुए बफर स्टॉक रखना और वैकल्पिक रूट्स पर विचार करना अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत बन चुका है। होर्मुज स्ट्रेट की ये नई हकीकत अब लंबे समय तक हमारे साथ रहने वाली है।